आइए करें, पृथ्वी पर स्थित आठवें बैकुंठ का दर्शन !
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    आइए करें, पृथ्वी पर स्थित आठवें बैकुंठ का दर्शन !

    भारतवर्ष के उत्तरी भाग में अवध क्षेत्र में स्थित है नैमिषारण्य जहां परम पावन श्री चक्रतीर्थ विद्यमान है। नैमिषारण्य धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं ऐतिहासिक पुण्यभूमि है।
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    अवधपति दशरथ के पुत्र एवं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र के छोटे भाई लक्ष्मण के नाम पर बसी लक्ष्मणावती मुख सुख से हुई लखनौती, जो बाद में लखनऊ कहलाई।
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    लखनऊ से रेलवे की छोटी लाइन से जनपद सीतापुर जाना पड़ता है। सीतापुर से रेलवे की बड़ी लाइन या सड़क मार्ग से नैमिषारण्य पहुंचते हैं।
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    यहां पंडा, पुजारियों के घरों एवं धर्मशालाओं तथा यात्रीशालाओं में ठहरा जा सकता है। श्री चक्रतीर्थ एक बड़ा गोलाकार जलाशय है, जो वृहताकार गोल घेरे में आबद्ध है।
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    घेरे के चारों ओर बाहर जल भरा रहता है जिसमें श्रद्धालु भक्तजन स्नान करते हैं यानी इस मनोहर चक्रतीर्थ में डुबकी लगाते हैं तथा जल में चलते हुए इस गोल चक्र की परिक्रमा भी करते हैं।
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    बाह्य जल के भरे हुए घेरे के बाद चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं तथा स्थान-स्थान पर विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिर हैं। यहां आने-जाने का सुंदर द्वार भी बना हुआ है।
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    पुराणों में नैमिषारण्य की स्थिति को व्यक्त करने वाले जिस चक्र का वर्णन किया गया है वह कोई साधारण यंत्र नहीं, बल्कि संसार को धारण करने वाले प्रकट तत्व ब्रह्म की वह गोल परिधि है जो काल रूप से विश्व में प्रत्यावर्तन करता है।
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    देवी स्थापना, वृक्ष लगाना यहां पुण्य माना जाता है। यहां दो प्रकार की परिक्रमा सुविख्यात है-प्रथम, सवाकोसी और द्वितीय चौरासी कोसी (फाल्गुन अमावस्या से अष्टमी तक या होली तक)। यहां हजारों ऋषियों ने वास किया है।
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    यज्ञ पुरुष का यहां वास स्थान है। ऋषेश्वर नाथ शिव का प्राकट्य यहीं हुआ था। ब्रह्मांड के सारे तीर्थ यहां विराजमान हैं। ऐसा स्थान अन्यत्र कहीं नहीं है। यहां पिंड दान भी होता है।